वह मुसलमान शख्स अभी भी जिन्दा है जिसने दिया था शहीद-ए-आज़म भगत सिंह को आश्रय….

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भगत सिंह ब्राह्मण के भेष में बैरिस्टर आसिफ अली के नाम का पैगाम लेकर चंगेजी के पास आये जिसमे लिखा था कि यह आपके पास रहेगा. और उन्होंने भगत सिंह को आश्रय दिया. भगत सिंह के भोजन के लिए बराबर की दूसरी गली में रहने वाले चंगेजी के दोस्त दयाराम जो वकालत कर रहे थे के घर से खाना आता था.

फिरोजशाह कोटला के खंडहरों में बैठक हुई. उस समय नेशनल असेंबली में बम फेंकने की योजना बनी थी. यह काम भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को सौंपा गया. भगत सिंह सुबह नाश्ता कर ब्राह्मण के भेष में निकल जाते और नेशनल असेंबली में मौका मुआयना करते कि कहां से बम फेंकने के लिए जाना है. भगत सिंह ने एक दिन बताया कि मुझे असेंबली में प्रवेश करने का रास्ता मिल गया है.

उन्होंने कहा था कि मैं बम फेंकूंगा जरूर, मगर कोई मरेगा नहीं. मेरा मकसद किसी को मारना नहीं है. उस जमाने में कोई मुखबिरी नहीं करता था. पुलिस को नहीं पता था कि भगत सिंह दिल्ली आ चुके हैं. चंगेजी बताते है की स्वाधीनता आंदोलन हम भी लड़ रहे थे, मगर भगत सिंह के सिर पर तो आजादी का जुनून सवार था. जज्बा ऐसा था कि वह किसी भी समय देश के लिए शहीद हो जाने के लिए तैयार थे, जबकि उनसे पहले उनके साथी अशफाक उल्ला खां को 1927 में फांसी हो चुकी थी.

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