आखिर गंगा में क्यों टेढ़ा खड़ा है ये शिव मंदिर, इस Mystery को सॉल्व करने में साइंस भी है फेल

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वाराणसी.तिथि के कन्फ्यूजन की वजह से देश के कुछ हिस्सों में जहां मंगलवार को शिवरात्री मनाई गई, वहीं कुछ क्षेत्रों में वेलेंटाइन्स डे के मौके पर यह व्रत-पूजा की जाएगी। क्या आप जानते हैं कि जिस नगरी में शिवजी शादी के बाद आकर बसे थे, वहां बने उनके एक मंदिर में पूजा नहीं की जाती। महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर बना रत्नेश्वर महादेव मंदिर साल के 9 महीने जल-मग्न रहता है। यही नहीं, यह मंदिर अज्ञात कारणों से टेढ़ा भी बना है।

MYTH नंबर 1. – तीर्थ पुरोहित गोपाल ने बताया, “200 साल पहले अहिल्याबाई होल्कर की दासी रत्ना बाई ने इसे बनवाया था। बाढ़ का समय था। तब बहुत सारे कछुए नदी में आते हैं। कछुओं की वजह से मंदिर की नींव से गिट्टी हटा गईं थीं, जिससे मंदिर टेढ़ा हो गया।”

क्या कहते हैं फैक्ट – अल्वर मंदिर के प्रमुख पुजारी डॉ. कमला कांत शर्मा ने बताया, “इस मंदिर की स्थापना अहिल्याबाई के समक्ष मराठा महिला रत्ना मां ने की थी। 18वीं शताब्दी में जेम्स प्रिंसेप के रेखा चित्रों में मंदिर स्ट्रेट दिखाई पड़ता है। संभवतः भार की वजह से यह बाद में एक ओर धंस गया।” – राजस्व रिकॉर्ड में भी मंदिर का निर्माण महरानी अहिल्या बाई होल्कर की सिपहसलाकर रत्ना बाई द्वारा 1825-1830 के बीच दर्ज है। जानकारों के मुताबिक निर्माण के वक्त नींव और पत्थरों में एयर गैप रह गया होगा, जिससे मंदिर झुक गया।

मंदिर की AGE भी है कन्फ्यूजिंग – इस मंदिर का निर्माण कब हुआ था इसे लेकर भी अलग-अलग दावे हैं। रेवेन्यू रिकॉर्ड के मुताबिक इसका कंस्ट्रक्शन 1825 से 1830 के बीच हुआ। वहीं रीजनल आर्कियोलॉजी ऑफिसर के मुताबिक यह 18वीं शताब्दी में बनकर तैयार हुआ था। घाट के आसपास बसे पुरोहितों का मानना है कि रत्नेश्वर महादेव की स्थापना 15वीं सदी में हुई थी।

इंग्लिश स्पेशलिस्ट कर चुके हैं रिसर्च – इतिहासकार एसके सिंह के मुताबिक 18वीं शताब्दी के आसपास जेम्स प्रिंसेप ने अपने द्वारा बनाए बनारस के स्केच में रत्नेश्वर महादेव मंदिर को उकेरा था। – बताया जाता है कि अंग्रेजों ने भी मंदिर के टेढ़ा होने के पीछे काफी रिसर्च की थी। – कई दिनों तक अंग्रेज विशेषज्ञों की टीम ने दौरा भी किया था।

MYTH नंबर 2. अहिल्या बाई ने दिया था श्राप पुरोहित श्याम शंकर तिवारी के मुताबिक इस मंदिर का निर्माण अहिल्या बाई की दासी ने करवाया था। अहिल्या बाई होलकर शहर में मंदिर और कुण्डों निर्माण करा रही थीं। उसी समय रानी की दासी रत्ना बाई ने भी मणिकर्णिका कुण्ड के समीप शिव मंदिर निर्माण कराने की इच्छा जताई। निर्माण के लिए उसने अहिल्या बाई से पैसे उधार लिए थे। वो मंदिर देख प्रसन्न थीं, लेकिन उन्होंने रत्ना बाई से कहा था कि वह इस मंदिर को अपना नाम न दे। दासी ने उनकी बात नहीं मानी और मंदिर का नाम रत्नेश्वर महादेव रखा। इस पर अहिल्या बाई नाराज़ हो गईं और श्राप दिया कि इस मंदिर में बहुत कम ही दर्शन-पूजन हो पाएगी। तभी मंदिर टेढ़ा हो गया और साल में ज्यादातर समय गंगा में डूबा रहता है।

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